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BIHAR TEACHER NEWS: बिना मंजूरी रेगुलर पढ़ाई कर रहे 800 शिक्षक जांच के घेरे में, फर्जी हाजिरी के आरोपों से बढ़ी मुश्किल

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | बिहार में करीब 800 सरकारी शिक्षक बिना विभागीय अनुमति रेगुलर कोर्स करने के मामले में जांच के घेरे में हैं। विभाग एडमिशन, उपस्थिति और नौकरी के रिकॉर्ड की जांच करेगा।

पटना, 29 अगस्त। बिहार के सरकारी स्कूलों में कार्यरत करीब 800 शिक्षकों की उच्च शिक्षा से जुड़ी गतिविधियां अब शिक्षा विभाग की जांच के दायरे में आ गई हैं। विभाग यह पता लगाने में जुटा है कि नौकरी में रहते हुए किन शिक्षकों ने बिना पूर्व अनुमति नियमित पाठ्यक्रमों में दाखिला लिया और क्या उनकी पढ़ाई के कारण स्कूलों में शिक्षण कार्य प्रभावित हुआ। जांच में पीएचडी, एमए, एमएससी, एलएलबी और एमएड जैसे नियमित पाठ्यक्रमों से जुड़े मामले सामने आने की बात कही जा रही है।

शिक्षा विभाग का रुख यह है कि सरकारी सेवा में रहते हुए शिक्षक अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ा सकते हैं, लेकिन इसके लिए विभागीय अनुमति लेना आवश्यक है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उच्च शिक्षा हासिल करने के कारण स्कूल में बच्चों की पढ़ाई और शिक्षक की जिम्मेदारी प्रभावित न हो।

मामला तब गंभीर हो जाता है जब नियमित पाठ्यक्रम के लिए शिक्षक को किसी विश्वविद्यालय या कॉलेज में निर्धारित समय पर उपस्थित रहना पड़ता है। विभाग अब यह जांचना चाहता है कि ऐसे शिक्षक संबंधित अवधि में वास्तव में स्कूल में मौजूद थे या नहीं। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करने वाले कुछ शिक्षकों के मामले भी जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं।

जांच में केवल डिग्री या एडमिशन की जानकारी पर निर्भर नहीं किया जाएगा। शिक्षा विभाग प्रखंड स्तर से रिपोर्ट लेने के साथ संबंधित विश्वविद्यालयों से भी रिकॉर्ड जुटाने की तैयारी में है। इसमें एडमिशन की तारीख, कोर्स का प्रकार, कक्षाओं में उपस्थिति और पाठ्यक्रम की अवधि जैसी जानकारियों का मिलान किया जा सकता है।

सबसे गंभीर आरोप उपस्थिति को लेकर सामने आए हैं। कुछ मामलों में शिक्षकों द्वारा आपस में तालमेल कर स्कूल में उपस्थिति दर्ज कराने की बात कही जा रही है। आरोप है कि एक शिक्षक नियमित कोर्स के लिए बाहर रहता था तो उसकी जगह दूसरा शिक्षक उपस्थिति की व्यवस्था करता था। कुछ मामलों में मोबाइल के माध्यम से उपस्थिति दर्ज कराने की बात भी जांच के दायरे में है।

यदि जांच में ऐसे आरोप प्रमाणित होते हैं तो मामला केवल बिना अनुमति उच्च शिक्षा हासिल करने का नहीं रहेगा। फर्जी उपस्थिति, सरकारी सेवा नियमों के उल्लंघन और स्कूल में निर्धारित जिम्मेदारी से अनुपस्थित रहने जैसे पहलुओं पर भी कार्रवाई की जा सकती है।

विभाग की नजर अब शिक्षक की नौकरी और उसके उच्च शिक्षा रिकॉर्ड के बीच तालमेल पर है। मसलन, शिक्षक ने किस वर्ष नौकरी ज्वाइन की, किस समय विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, पाठ्यक्रम कब पूरा किया और उस अवधि में स्कूल में उसकी उपस्थिति कैसी रही—इन सभी बिंदुओं का मिलान किया जा सकता है।

यही वजह है कि जांच के बाद हर शिक्षक की स्थिति अलग-अलग सामने आएगी। केवल किसी शिक्षक के नियमित पाठ्यक्रम में नामांकन होने से यह साबित नहीं होता कि उसने सेवा नियम तोड़े हैं। यदि विभागीय अनुमति ली गई थी और स्कूल की पढ़ाई प्रभावित नहीं हुई, तो स्थिति अलग होगी। इसी तरह आरोपों की पुष्टि होने के बाद ही जिम्मेदारी तय की जाएगी।

शिक्षा विभाग की नीति के अनुसार नौकरी के साथ उच्च शिक्षा हासिल करने का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है। लेकिन ऐसी पढ़ाई के लिए पहले से अनुमति लेने की व्यवस्था है। दूरस्थ और ऑनलाइन शिक्षा के विकल्पों को इसलिए भी महत्व दिया जाता है ताकि शिक्षक अपनी नौकरी की जिम्मेदारियों को निभाते हुए आगे की पढ़ाई कर सकें। IGNOU और नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के माध्यम से पढ़ाई करने वाले शिक्षकों को लेकर व्यवस्था अपेक्षाकृत सुविधाजनक मानी जाती है।

शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी का कहना है कि शिक्षकों को अपनी योग्यता बढ़ाने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन इसका असर बच्चों की पढ़ाई पर नहीं पड़ना चाहिए। सरकार का जोर इस बात पर है कि उच्च शिक्षा हासिल करने वाले शिक्षक नियमों के तहत विभागीय अनुमति लेकर ही नियमित पाठ्यक्रम करें।

दूसरी ओर, शिक्षक संगठनों का कहना है कि उच्च शिक्षा शिक्षकों के पेशेवर विकास के लिए महत्वपूर्ण है। शिक्षक संघ के प्रदेश सचिव आनंद मिश्रा ने अनुमति की प्रक्रिया को सरल बनाने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि शिक्षकों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और विभागीय मंजूरी की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

करीब 800 शिक्षकों से जुड़ी जांच का दायरा बड़ा है। इसलिए विभाग के सामने एक चुनौती यह भी होगी कि सभी मामलों की निष्पक्ष तरीके से अलग-अलग जांच की जाए। किस शिक्षक ने किस परिस्थिति में दाखिला लिया, विभागीय अनुमति ली थी या नहीं, कोर्स की प्रकृति क्या थी और स्कूल में उसकी उपस्थिति कैसी रही—इन सभी सवालों के जवाब रिकॉर्ड से तलाशे जाएंगे।

यदि किसी शिक्षक के खिलाफ नियम उल्लंघन साबित होता है तो विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। संभावित कार्रवाई में निलंबन, वेतन वृद्धि पर रोक और पदोन्नति प्रभावित करने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। हालांकि किसी भी शिक्षक के खिलाफ अंतिम कार्रवाई जांच में सामने आए तथ्यों और विभागीय प्रक्रिया के आधार पर ही होगी।

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई है। शिक्षक की अनुपस्थिति का सीधा असर विद्यार्थियों पर पड़ सकता है। इसलिए उच्च शिक्षा और सरकारी सेवा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। शिक्षकों को आगे पढ़ने का अवसर मिले, लेकिन इसके लिए ऐसा रास्ता हो जिससे कक्षा संचालन बाधित न हो।

फिलहाल शिक्षा विभाग की जांच आगे बढ़ने के साथ यह स्पष्ट होगा कि करीब 800 मामलों में कितने शिक्षक वास्तव में नियमों के उल्लंघन के दोषी पाए जाते हैं और कितने मामलों में प्रक्रिया के तहत अनुमति या वैध कारण मौजूद है। जांच पूरी होने के बाद ही तस्वीर साफ होगी। फिलहाल इतना जरूर है कि सरकारी नौकरी के साथ नियमित उच्च शिक्षा हासिल करने वाले शिक्षकों के रिकॉर्ड की अब गंभीरता से पड़ताल की जा रही है।

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बच्चों की पढ़ाई और शिक्षक की जिम्मेदारी के बीच संतुलन जरूरी

सरकारी शिक्षक का उच्च शिक्षा हासिल करना गलत नहीं है। वास्तव में शिक्षक जितना अधिक ज्ञान और योग्यता हासिल करेगा, उसका लाभ विद्यार्थियों को भी मिल सकता है। समस्या तब पैदा होती है जब उच्च शिक्षा के लिए शिक्षक की नियमित उपस्थिति स्कूल से गायब होने लगे।

करीब 800 शिक्षकों की जांच को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। अगर किसी शिक्षक ने नियमों के अनुसार अनुमति ली है और उसकी पढ़ाई से स्कूल की व्यवस्था प्रभावित नहीं हुई, तो उसे दोषी मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि कोई शिक्षक नियमित कोर्स के नाम पर लंबे समय तक स्कूल से बाहर रहा और कागज पर उसकी उपस्थिति बनी रही, तो यह गंभीर मामला है।

सरकार को जांच में पारदर्शिता रखनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही शिक्षकों के लिए उच्च शिक्षा की अनुमति प्रक्रिया को सरल बनाना भी जरूरी है। नियम इतने कठिन नहीं होने चाहिए कि शिक्षक मजबूरी में गलत रास्ता अपनाएं।

अंततः सबसे महत्वपूर्ण विद्यार्थी हैं। शिक्षक की पढ़ाई भी जरूरी है और स्कूल में उसकी मौजूदगी भी। व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें दोनों के बीच टकराव न हो।

बिना अनुमति रेगुलर कोर्स पर शिक्षा विभाग की सख्ती, रिकॉर्ड खंगालने की तैयारी

बिहार शिक्षा विभाग अब सरकारी शिक्षकों की नौकरी और उच्च शिक्षा से जुड़े रिकॉर्ड का मिलान कराने की तैयारी में है। करीब 800 शिक्षकों के मामलों में यह जांच की जाएगी कि उन्होंने नौकरी के दौरान किस संस्थान में दाखिला लिया, कोर्स कब किया और विभाग से आवश्यक अनुमति ली थी या नहीं।

जांच में विश्वविद्यालयों से एडमिशन और उपस्थिति संबंधी जानकारी लिए जाने की बात कही जा रही है। यदि किसी मामले में फर्जी उपस्थिति या सेवा नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित शिक्षक के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हो सकती है।

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